Meanderings……

The body is a Temple in which the Soul Divine resides.

In life, one should have Silence, Solitude and Inner Peace. And one’s mind, should be Still, Silent and Steady.

Always remember, no one is ever lost and lonely, one is always found and accompanied by the Almighty. Hence, never be disappointed and despondent for too long. Never ever give-up on God!

Never forget, none is ever weak and vulnerable, each one is protected and defended by the Divine. Therefore, never loose courage and hope. Keep the Faith alive!

Every one of us have to go through our own Ocean of Grief to reach the lasting Shore of Peace.

When one goes beyond one’s own limits and boundaries, then one reaches the Supreme Almighty, who is truly limitless and boundless eternally.

Divine Aspirations are incomplete and remain unfulfilled without a thorough and absolute self-transformation. Renewal is the road that will the pave the way to the Divine Destination.

And now, a few parting thoughts, some times take a break from a state of constant and ceaseless thinking and for reprieve, look at the sky, feel the breeze, soak the sun and actually smell the roses! And of course, never fail to thank God for the small mercies!

A Few Gentle Reminders

Life is a Journey of Discovery. A discovery of our own self, of others, of the world and the Beyond.

Life is not unidimensional but multidimensional. There are many ways to live life. We have to discover our own way.

We have to look at ourselves with our own eyes and our own vision and learn to think of ourselves through our own thoughts.

We have to realize ourselves, materialize that which makes us happy and be glad to be who we are.

Sometimes, we have to disconnect ourselves from our own life and try to take a panoramic view of it. From here, we would know better where we are and where we need to go and what it is that needs to be fixed.

विचार विहार

सारा वक्त हम संसार की गतिविधियों में ही उलझे रहते हैं। फलस्वरूप, हमारी आत्मा मलीन हो गई है और हम भगवान से दूर हो गए हैं। दुनियादारी की कालिख ने हमारी आत्मा के दैवीय प्रकाश को धूमिल कर दिया है। सत्संग में भाग लेने से और ज्ञानी जनों से मार्ग दर्शन लेने से आत्मा पर चढ़ी मैल की पर्तें धीरे-धीरे उतरती है और प्रभु से निकटता बढ़ती है।

किसी के भी प्रति मन में कोई भी कटुता या फिर शत्रुता के दुर्भाव जब हम रखते हैं, तो उससे हम अपना ही नुकसान करते हैं। धीरे-धीरे यही विष बन कर हमारे ही अंदर फैलने लगता है और हमे ही भीतर से खोखला कर देता है। इसीलिए, सबका हित तो इसी मे है, की जीवन में यदि कोई दुर्भाग्यवश अप्रिय घटना हो भी गई हो तो भी बीती बातें बिसरा कर मन स्वच्छ रखते हुए समय के साथ आगे बढ़ा जाए। ज्ञान की बातें सुनने से व ज्ञानी जनों की संगत से मन हल्का और साफ रहता है और किसी भी प्रकार की गंदगी देर तक हमारे अंदर नहीं टिक पाती।

प्रत्येक वृतांत या वाकया जो हमारे जीवन में संघटित होता है, वह ईश्वर के समीप आने के लिए ही होता है। रास्ता भी वही हैं और मंज़िल भी। जब हमे कोई चारा नहीं मिलता तब ऐसी स्थिति में हम ईश्वर की ओर देखते हैं। और फिर यहीं से शुरुआत होती है एक नए सफर और एक नए रिश्ते की। एक बार जब हम सम्पूर्ण समर्पण से प्रभु को अपनी हर समस्या सौंप देते हैं, तो फिर हम न सिर्फ यह पाते हैं की कैसे भगवान हमारी हर समस्या का समाधान करते हैं वरन, यह भी पता चल जाता है की ईश्वर हमारे सच्चे हितैषी हैं और सदा ही हमारे साथ होते हैं। और फिर बस यहीं से हमारे और प्रभु के एक अनोखे, विश्वासनिय और अनंत रिश्ते की नीव पड़ती है।

अब नहीं उदास

घड़ियों को मुट्ठी में न पकड़ो, समय की आंधी इन्हे उड़ा ले जाएगी। जब मुट्ठी खुलेगी तो खाली ही रह जाएगी।

हाँ मगर जब मुट्ठी खुलेगी, तो हाथ दुआ में उठेंगे, और तब, रब हर एक की झोली खुशियों से भर देंगे।

यह बात हमेशा ही रखना याद।

आज से जब कभी भी टूट सी जाए हर आस, तो फिर बस इतना रखना विश्वास, की रब तक पहुँचती है हर सच्चे दर्द और दुआ की आवाज़।

और जब होते हैं रब अपने साथ, तब सवेरा होता ही है चाहे कितनी ही लम्बी और गहरी क्यों न हो रात।

इसीलिए, अब से हम जब भी होंगे उदास, तो याद रखेंगे इतनी सी बात, की हर क्षण है इश्वर हमारे पास।

होली मुबारक

लाल की उत्साह भरी लाली, हरे की खिली-खिली हरियाली,

पीले का गहरा ठहराव, नीले का अनंत फैलाव,

सफेद की शीतल कांति, काले की असीम शांति,

गुलाबी की खुशहाल उमंग, केसरिया की ताप तरंग,

हर रंग हो मुबारक, होली मुबारक!

मंज़िल और मुस्कान

हमारी मंज़िल अभी दूर है, हाँ मगर पहुंचना वहाँ ज़रूर है।

कुछ अलग चाह है अपनी, इसीलिए तो औरों से कुछ जुदा राह है अपनी।

कभी गिरते हैं तो कभी सम्भलते हैं, हाँ मगर फिर भी आगे ज़रूर बढ़ते हैं।

भले नज़रें अभी ज़रा धुंधलाई हैं, मगर हौसलों में अब भी कोई कमी न आने पाई है।

भले ही मंज़िल अभी न हो पास, फिर भी सफर में बनी रहे आस और मन न होने पाए ज़रा भी उदास।

रास्ते मुश्किल हों या आसान, कभी न आए चहरे पे थकान और हमेशा ही होटों पर खिली रहे एक प्यारी सी मुस्कान।

एक दुआ

जो फैला है, वह बंध जाए, जो छितरा है, वह सिमट जाए।

जो खोया है, वह मिल जाए, जो ढूंढ रहा है, वह पा जाए।

जो भटका है, वह मंज़िल तक पहुंच जाए, जो बिखरा है, वह एकत्रित हो जाए।

अपनी तो बस एक यही है दुआ, की, हर एक के जीवन से बादल छंट जाए और बहार हर ओर छा जाए, गहरी सियाह रात कट जाए और सूरज की सुनहरी किरनें हर छोर रौशन कर जाए, हर एक सहरा के रेत में रंग-बिरंगे फूल खिल-खिलाए और हर किसी की ज़िंदगी में उदासियों के सायों में उम्मीदों के अनगिनत दीप जगमगाए।

अपनी तो बस एक यही है दुआ, की, ईश्वर हर एक की दुआ कबूल कर लें और सबकी झोली खुशियों से भर जाए, ऊपरवाला हर एक पर रहम करे और सभी के चहरों पर मुस्कान खिल जाए।

एक भी अनेक भी

जीवन तो एक ही है, मगर जन्म तो इसमें अनेक हैं।

ज़िंदगी में हो रहा हर एक वाक्या, घट रही हर एक घटना, कुछ बदलती है, कुछ सिखाती है, कुछ भुलाती है तो कुछ बताती है।

कुछ पीछे छोड़ते हैं, तो कुछ ले के आगे बढ़ते हैं।

जैसे कल शुरुआत की थी, वैसे आज नहीं हैं, और जैसे आज हैं, वैसे कल नहीं होंगे।

नाम और रूप तो शायद वही रहते हैं, मगर जो इन्सान है, वह हमेशा ही बदलता रहता है, टूटता और संवरता रहता है, गिरता और सम्भलता रहता है, बिखरता और निखरता रहता है, जीवन तो एक ही है, हाँ मगर जन्म तो इसमें हमेशा नया होता ही रहता है।

छोटी सी बात

सदा हम स्व्यं पर निर्भर करेंगे, और अगर करना ही होगा किसी अन्य पर तो, ईश्वर पर भरोसा रखेंगे। प्रभु हर समस्या का समाधान करेंगे, इतना विश्वास कर के ही हम जीवन पथ पर आगे बढ़ेंगे। अब तो बस, सत्य, निष्ठा और भगवन के संग हम हमेशा ही हँसते मुस्कुराते उम्र भर चलते चलेंगे।

और एक बात हमेशा ही जो रखना याद, जीवन से बड़ा कोई तप नहीं, अनुभव से अच्छी कोई पुस्तक नहीं।

खूबसूरत नज़ारे जो हैं ज़िंदगी के सहारे

उदासियों की राहों से गुज़र कर ही उम्मीदों के मंज़र दिखते हैं।

अंधेरों के सायों से निकल कर ही उजालों के काफिले मिलते हैं।

ग़मों की दहलीज़ पार कर के ही खुशियों के द्वार खुलते हैं।

पत्थरीले रास्तों पर चल कर ही राहों में गुल खिलते हैं।

धूप में तप कर ही ठण्डी छांव में कुछ पल गुज़रते हैं।

और इसलिए, अब तो आंधियों में भी सदा ही मन के चिराग जगमग करते हैं।