रिश्ते

मनुष्य को अपने एक ही जीवन काल में अनेक रिश्ते निभाने होते हैं। पहला वह रिश्ता है, जो, हम अन्य लोगों के साथ निभाते हैं। इन रिश्तों के भी अनान्य रूप व आकार होते हैं। जैसे, पारिवारिक, सामाजिक, व्यवसायिक इत्यादि । इन सभी के परस्पर ताल – मेल से ही हम भौतिक सफलता पाते हैं। यह सभी रिश्ते निभाने हमारे जीवन के सांसारिक स्तर के संचारन के लिए अनिवार्य है ।

कई रिश्ते व्यक्तिगत श्रेणी के होते हैं। यह रिश्ते हमारे भावनात्मक पक्ष के विकास के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। यह हमारे जीवन में पर्व व उत्सव लाते हैं और जीवन को रंग बिरंगा बनाते हैं।

एक रिश्ता वह होता है जो जीव का आत्मा से होता है । इन्सान का अपनी आत्मा से एक ख़ास रिश्ता होता है । यह रिश्ता विकसित करने से इन्सान की ख़ुद से मुलाकात होती है और वह यह जान पाता है की आखिर वह है कौन और उसके जीवन का सच्चा उद्येश्य क्या है । मानसिक विस्तार की यह राह हमें नित नए आयामों तक ले जाती है ।

और यहीं से शुरूआत होती है हमारे सर्वोच्च रिश्ते की, जो है आत्मा का परमात्मा से। जैसे -जैसे इस रिश्ते में दूरियां मिटती चली जाती हैं वैसे-वैसे हम अपने जीवन के लक्ष्य के समीप बढ़ते चले जाते हैं। आत्मा से परमात्मा के मिलन में ही मनुष्य जीवन की सच्ची सार्थकता है । आध्यात्मिक राह पर चल कर हम न सिर्फ अपनी उन्नति की ओर बढ़ते वरन अपने परिवार, समाज, विश्व व ब्रह्मांड के कल्याण के माध्यम बनते हैं।

एक ही समय पर हमें जीवन के इन विभिन्न चरणों से गुज़रना है । एक व्यवस्थित जीवन शैली अपना कर हम यह जीवन सफर सफल बना सकते हैं।

हर चीज़ की अपनी एक जगह है, अपना एक मूल्य है । हर चीज़ को उसके सही स्थान पर रखिए और उसके सही मूल्य को जानिए । और इस तरह जीवन को उसके उचित गंतव्य तक पहुंचाइये।

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