विचार विहार

सारा वक्त हम संसार की गतिविधियों में ही उलझे रहते हैं। फलस्वरूप, हमारी आत्मा मलीन हो गई है और हम भगवान से दूर हो गए हैं। दुनियादारी की कालिख ने हमारी आत्मा के दैवीय प्रकाश को धूमिल कर दिया है। सत्संग में भाग लेने से और ज्ञानी जनों से मार्ग दर्शन लेने से आत्मा पर चढ़ी मैल की पर्तें धीरे-धीरे उतरती है और प्रभु से निकटता बढ़ती है।

किसी के भी प्रति मन में कोई भी कटुता या फिर शत्रुता के दुर्भाव जब हम रखते हैं, तो उससे हम अपना ही नुकसान करते हैं। धीरे-धीरे यही विष बन कर हमारे ही अंदर फैलने लगता है और हमे ही भीतर से खोखला कर देता है। इसीलिए, सबका हित तो इसी मे है, की जीवन में यदि कोई दुर्भाग्यवश अप्रिय घटना हो भी गई हो तो भी बीती बातें बिसरा कर मन स्वच्छ रखते हुए समय के साथ आगे बढ़ा जाए। ज्ञान की बातें सुनने से व ज्ञानी जनों की संगत से मन हल्का और साफ रहता है और किसी भी प्रकार की गंदगी देर तक हमारे अंदर नहीं टिक पाती।

प्रत्येक वृतांत या वाकया जो हमारे जीवन में संघटित होता है, वह ईश्वर के समीप आने के लिए ही होता है। रास्ता भी वही हैं और मंज़िल भी। जब हमे कोई चारा नहीं मिलता तब ऐसी स्थिति में हम ईश्वर की ओर देखते हैं। और फिर यहीं से शुरुआत होती है एक नए सफर और एक नए रिश्ते की। एक बार जब हम सम्पूर्ण समर्पण से प्रभु को अपनी हर समस्या सौंप देते हैं, तो फिर हम न सिर्फ यह पाते हैं की कैसे भगवान हमारी हर समस्या का समाधान करते हैं वरन, यह भी पता चल जाता है की ईश्वर हमारे सच्चे हितैषी हैं और सदा ही हमारे साथ होते हैं। और फिर बस यहीं से हमारे और प्रभु के एक अनोखे, विश्वासनिय और अनंत रिश्ते की नीव पड़ती है।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.