काम की बातें

हम सभी में कोई न कोई हुनर, गुण या प्रतिभा होती है। यह ईश्वर की हम पर अनुकम्पा है। चाहे वह कोई भी गुण हो, वह हमारे पास भगवान की अमानत है। यह उन्हीं की कृपा है और वे चाहें तो कभी भी हमसे यह उपहार वापस ले सकते हैं। इसीलिए, हमें अपनी किसी भी प्रतिभा,या शक्ति का दुरुपयोग कभी नहीें करना चाहिए। जहाँ तक हो सके हमे हमारी हर क्षमता और हमारी हर ख़ासियत को सबकी भलाई के लिए उपयोग में लाना चाहिए। और इसका इस्तेमाल किसी को नीचा दिखाने या किसी का अहित करने के लिए तो कतई नहीं करना चाहिए व स्वंय को एक सुपात्र साबित कर ईश्वर के निकट पहुंचने का प्रयास करना चाहिए।

हम हमेशा नई चीज़ों, लोगों, जगहों की तलाश में लगे रहते हैं। और कभी-कभी इन सभी भौतिक उपलब्धियों से हमे क्षणिक प्रसन्नता भी हासिल हो जाती है। लेकिन, फिर जल्द ही हमारा मन भर जाता है और हम किसी नई खोज पर निकल पड़ते हैं। परंतु, यदि हम रचना के पार जा के रचेता को ढ़ूढेंगे तो हमारी यह खोज, यह तलाश हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी, रुक जाएगी, और मन और आत्मा दोनो ही सदा के लिए तृप्त हो जाएंगे।

दुनिया बड़ी विशाल है। और हमे इसी दुनिया में अपनी खुद की एक छोटी सी दुनिया बनानी है। हमारी इस छोटी सी दुनिया में सिर्फ वही गतिविधियां होनी चाहिए जिससे हमें सच्चा सन्तोष मिले, और वही लोग इसमे शामिल होने चाहिए जिनके विचार हमसे मिलते-जुलते हैं व सकारात्मकता और रचनात्मकता से परिपूर्ण हैं। हमारी इस छोटी सी दुनिया में नकारात्मकता का कोई स्थान न हो, भले ही अपनी दुनिया छोटी हो पर सच्ची और अच्छी हो, तनाव और भीड़-भाड़ से मुक्त ज़िंदगी खुशहाल और भरपूर हो।

जब कभी भी किसी भी प्रकार का द्वंद्व हो, आंतरिक या बाहरी, तब सदा ही अपनी अंतरआत्मा की आवाज़ सुननी चाहिए। कहीं दुनिया की भीड़ में और लोगों के शोर-गुल में ऐसा न हो की हमारी आत्मा की ध्वनि अनसुनी ही रह जाए। आत्मा तो परमपिता परमेश्वर का ही तो एक अंश है। इसीलिए, इसकी पुकार को कभी झुठलाना या अनदेखा नहीं करना चाहिए। लोगों की आवाज़ें तो अनेक हैं, और हमेशा बदलती ही रहती है मगर आत्मा की तो बस एक ही पुकार होती है। इसको सुनने का प्रयास करना चाहिए। हर कोई एक नई बात बताएगा, परन्तु आत्मा की पुकार तो स्थाई और सदा ही हितकर बनी रहती है। हमारी आत्मा ही तो हमारी सच्ची साथी है, जन्म से पहले भी, जीवन के साथ भी और इस जीवन के बाद भी।

हम जब कभी भी अपनी अंतरआत्मा की न सुन कर इसके विरुध्द जाते हैं, तब हम परमात्मा को निराश करते हैं। मगर, परमात्मा इतने दयालु और कृपालु हैं की कभी हमसे नाराज़ नहीं होते, और सदा हमे क्षमा कर जीवन में निरंतर चलते रहने और आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देते ही रहते हैं।

जैसे-जैसे संसार की ओर रूझान घटेगा, वैसे-वैसे ईश्वर की ओर झुकाव बढ़ेगा।

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