भूल भुलैय्या

सांझ ढले सूरज का बुझ कर सवेरे फिर निखरना,

चन्द्रमा का बादलों में छिप कर भी निकलना,

तारों के झुरमुट का विशाल आकाश में टिम- टिम कर रात्रि भर चमकना,

पवन का कभी मंद तो कभी तेज़ चलना,

नदिया का कभी दरिया बन तो कभी झरना बन बहना,

मिट्टी का हर आकार और रूप के सांचे में सहज ही ढलना,

खूशबू का एक समान चहुंओर सदा ही बिखरना,

अग्नि का हमेशा ही जल कर अंधेरों में उजाले भरना,

वसंत में रंग-बिरंगे फूलों का खिलना,

पतझर में छोटे-बड़े पत्तों का झड़ना,

सर्दीयों में सफेद बर्फ का गिरना,

गर्मियों में आग उगलते सूरज का चढ़ना,

वर्षा में बरसात का झिम-झिम कर बरसना,

यह सभी हमेशा अपने मूल रूप में रहते हैं व अपने मूल गुणों का निरंतर अनुसरण करते रहते हैं। तो फिर ऐसा क्यों हैं की, हम मनुष्य ही अपना मूल रूप व गुण भूल बैठे हैं? हमारी आत्मा, परमपिता परमात्मा का एक अंश है। इसका मूल रूप दिव्य है और सुख, शांति, आनंद व सन्तोष इसके स्वभाविक गुण हैं। संसार की भूल भुलैय्या में उलझ कर हमने अपना मूल सत्य कहीं खो दिया है, भुला दिया है। जब हम अपने मूल रूप की ओर लौटेंगे तो हमारे जीवन में सुख, शांति व सन्तोष की बहार छा जाएगी। अध्ययन, चिंतन, ज्ञानी जनों से मार्ग- दर्शन व हरी भजन से भटका मन और जीवन अपने सत्य रूप की ओर लौट जाएंगे। संसार की भूल भुलैय्या से निकल कर जब हम उस अनंत और आनंद के सागर तक पहुंचेंगे तो जीवन में प्रसन्नता और उत्साह की लहरों से हम सराबोर हो जाएंगे। इस दिव्य अनुभव की अनुभूति हम सभी को करने का प्रयास करना ही चाहिए, यह हमारा मूल कर्तव्य है।

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