A Few Thoughts…..

Go with the flow. Sometimes, it is better to be with the tide rather than to be against it, as one never knows it might take one along to hithero unexpected joy, surprise, unexplored breath taking sights to behold and provide many new lessons to learn.

Our inner and outer worlds should be in consonance with one another. Such a life is full of harmony and devoid of any form of conflicts and clashes.

Know your own self worth. Do not bother to prove anything to anyone. It is just not worth it because one can never please all, so it is better to please none at all!

Associate mostly with people who help to bring out the best in you and those who make you react negatively are best avoided.

Heed your inner calling. Try to listen to it and work upon realizing it in life and experience deep fulfillment and true enrichment.

And of course, never forget to be your own ‘happy’!

कश्ती के किनारे

तलाश अभी जारी है, सफर अभी बाकी है,

ईश्वर स्वयं इस जीवन न्य्या के माझी हैं,

प्रभु ही मझधार में हमारे खेवय्या और साथी हैं,

भरोसा है, कश्ती किनारे पहुंचेगी, हिम्मत न अभी हमने हारी है।

केंद्र बिंदू

इस विषय पर हम सभी को कभी-न-कभी अवश्य ही विचार करना चाहिए की हम कुछ भी करने से पहले यह अवश्य ही सोचते हैं की लोग क्या कहेंगे, दुनिया क्या कहेगी? लेकिन, क्या हमने कभी इस बात पर विचार किया है, की भगवान हमारे बारे में क्या कहेंगे या क्या सोचेंगे? हम हमेशा ही इन्सान की नज़रों में तो महान बनना चाहते हैं, लेकिन क्या हमें इस बात से कोई भी फर्क पड़ता है की हम ईश्वर की नज़रों में कहाँ हैं? जब हम प्रत्येक कार्य ईश्वर को ध्यान में रख कर करते हैं तो हमारा हर कार्य ही दिव्य बन जाता है। और हमारे पथ में आने वाली हर चुनौति का सामना करने का साहस और शक्ति भगवान हमे स्वयं ही प्रदान करते हैं। जब हम प्रभु को केन्द्र में रख कर अपना जीवन व्यतीत करते हैं तो पाते हैं की भगवान हमेशा ही हमारे साथ होते हैं और उन के जैसा हमारा कोई अन्य मित्र, शुभचिंतक या अभिभावक नहीं। इसीलिए, कभी ईश्वर का ध्यान करके और उन्हीं को समर्पित करके कोई कार्य कर के देखिए और आप ही अनुभव करिए की कैसे कदम-कदम पर ईश्वर की कृपा और उनका सहारा हर क्षण हमारे संग हैं। लोक और लोगों के लिए जिया गया जीवन लौकिक है और भगवान और उनके लिए जिया गया जीवन अलौकिक है!

मन उपवन

मन हर पल जाता है बदल, इसमें मची ही रहती है नित नई हलचल, इस मुश्किल का आखिर क्या है हल?

बात तो है बहुत ही आसान, हर समस्या का ढूंढने से मिल ही जाता है समाधान। अब न हो और परेशान क्योंकि प्रकृति की गोद में मिटेगी हमारी हर थकान।

कभी तारों की छांव में, तो कभी फूलों के गाँव में,

कभी बहते झरने की मुस्कान में, तो कभी रंग-बिरंगी चिड़ियों की उड़ान में,

कभी सूर्योदय के प्रकाश में, तो कभी सूर्यास्त के शांत आकाश में,

कभी पवन की मंद हवाओं में, तो कभी वर्षा की बरसती घटाओं में,

यहाँ मिलेगा तन को विश्राम और भटके मन को आराम क्योंकि, प्रकृति तो है वह पवित्र स्थान, जहाँ बसते हैं साक्षात भगवान।

काम की बातें

हम सभी में कोई न कोई हुनर, गुण या प्रतिभा होती है। यह ईश्वर की हम पर अनुकम्पा है। चाहे वह कोई भी गुण हो, वह हमारे पास भगवान की अमानत है। यह उन्हीं की कृपा है और वे चाहें तो कभी भी हमसे यह उपहार वापस ले सकते हैं। इसीलिए, हमें अपनी किसी भी प्रतिभा,या शक्ति का दुरुपयोग कभी नहीें करना चाहिए। जहाँ तक हो सके हमे हमारी हर क्षमता और हमारी हर ख़ासियत को सबकी भलाई के लिए उपयोग में लाना चाहिए। और इसका इस्तेमाल किसी को नीचा दिखाने या किसी का अहित करने के लिए तो कतई नहीं करना चाहिए व स्वंय को एक सुपात्र साबित कर ईश्वर के निकट पहुंचने का प्रयास करना चाहिए।

हम हमेशा नई चीज़ों, लोगों, जगहों की तलाश में लगे रहते हैं। और कभी-कभी इन सभी भौतिक उपलब्धियों से हमे क्षणिक प्रसन्नता भी हासिल हो जाती है। लेकिन, फिर जल्द ही हमारा मन भर जाता है और हम किसी नई खोज पर निकल पड़ते हैं। परंतु, यदि हम रचना के पार जा के रचेता को ढ़ूढेंगे तो हमारी यह खोज, यह तलाश हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी, रुक जाएगी, और मन और आत्मा दोनो ही सदा के लिए तृप्त हो जाएंगे।

दुनिया बड़ी विशाल है। और हमे इसी दुनिया में अपनी खुद की एक छोटी सी दुनिया बनानी है। हमारी इस छोटी सी दुनिया में सिर्फ वही गतिविधियां होनी चाहिए जिससे हमें सच्चा सन्तोष मिले, और वही लोग इसमे शामिल होने चाहिए जिनके विचार हमसे मिलते-जुलते हैं व सकारात्मकता और रचनात्मकता से परिपूर्ण हैं। हमारी इस छोटी सी दुनिया में नकारात्मकता का कोई स्थान न हो, भले ही अपनी दुनिया छोटी हो पर सच्ची और अच्छी हो, तनाव और भीड़-भाड़ से मुक्त ज़िंदगी खुशहाल और भरपूर हो।

जब कभी भी किसी भी प्रकार का द्वंद्व हो, आंतरिक या बाहरी, तब सदा ही अपनी अंतरआत्मा की आवाज़ सुननी चाहिए। कहीं दुनिया की भीड़ में और लोगों के शोर-गुल में ऐसा न हो की हमारी आत्मा की ध्वनि अनसुनी ही रह जाए। आत्मा तो परमपिता परमेश्वर का ही तो एक अंश है। इसीलिए, इसकी पुकार को कभी झुठलाना या अनदेखा नहीं करना चाहिए। लोगों की आवाज़ें तो अनेक हैं, और हमेशा बदलती ही रहती है मगर आत्मा की तो बस एक ही पुकार होती है। इसको सुनने का प्रयास करना चाहिए। हर कोई एक नई बात बताएगा, परन्तु आत्मा की पुकार तो स्थाई और सदा ही हितकर बनी रहती है। हमारी आत्मा ही तो हमारी सच्ची साथी है, जन्म से पहले भी, जीवन के साथ भी और इस जीवन के बाद भी।

हम जब कभी भी अपनी अंतरआत्मा की न सुन कर इसके विरुध्द जाते हैं, तब हम परमात्मा को निराश करते हैं। मगर, परमात्मा इतने दयालु और कृपालु हैं की कभी हमसे नाराज़ नहीं होते, और सदा हमे क्षमा कर जीवन में निरंतर चलते रहने और आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देते ही रहते हैं।

जैसे-जैसे संसार की ओर रूझान घटेगा, वैसे-वैसे ईश्वर की ओर झुकाव बढ़ेगा।

असली-नकली

कभी अगर ग़ौर से सोचेंगे तो पाएंगे, की हम हर वक्त, हर पल कोई न कोई मुखौटा पहने ही रहते हैं। और तो और मुखौटा भी समय और अवसर के मुताबिक बदलता रहता है। हर वर्ग के लिए और हर समूह के लिए एक नया मुखौटा होता है हमारे पास। इन मुखौटों की अदला-बदली में कहीं हम अपना असली चेहरा तो नहीं भूल बैठे हैं? कहीं इसे हमने हमेशा के लिए खो तो नहीं दिया है? खुद को वापस पाने के लिए, स्व्यं से पहचान बनाने के लिए, कुछ समय एकांत में व्यतीत करें, सत्संग में भाग ले के ज्ञानी जनों से मार्ग दर्शन प्राप्त करें, भजन व ईश्वर स्तुति गान में हिस्सा लें, ऐसी किताबों और पुस्तकों का अध्ययन करें जिससे जीवन से जुड़े हमारे ज्ञान कोष का विस्तार हो सके। इस प्रकार के निरंतर अभ्यास से हमारा स्वयं से परिचय होगा, हम खुद को जान व समझ पाएंगे और धीरे-धीरे इतने सहज व मन से इतने सुलझ जाएंगे की कभी किसी मुखौटे की किसी भी परिस्थित में आवश्यकता ही नहीं पड़गी, और मुखौटों से मुक्त एक स्वछंद और उन्मुक्त जीवन का अतुलनीय आनंद अनुभव करेंगे।

कभी यूं भी तो सोचो…..

जीवन में क्या मिला है, यह नहीं की क्या नहीं मिला है। हम क्या हैं, यह नहीं की हम क्या नहीं हैं। हमारी शक्ति क्या है, यह नहीं की हमारी दुर्बलता क्या है। जीवन को कभी इस नज़रिए से देखो, एक सुखद अनुभव की अनुभूति होगी।

हम हमेशा यही सोचते रहते हैं की हम कौन हैं, लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा है की जिनसे हम मेल-जोल कर रहे हैं वे कौन हैं? उनके जैसे आप बन के देखो, कभी किसी नए किरदार में ढ़ल के देखो, कभी खुद को भुला के देखो। बहुत कुछ नया जानने को मिलेगा, सीखने को मिलेगा।

कभी सोचा है, अगर यह अंधेरे न होते तो भला उजालों में इतने सुन्दर अक्स कैसे उभरते? कभी इन सायों की भी खूबसूरती पर ग़ौर करो, छाया का भी रूप सराहो, दर्द भी एक मिज़ाज है, इसे भी जानो-पहचानो, जीवन यात्रा और अधिक रोमांचक लगेगी।

जीवन की आती-जाती धूप-छांव को सहजता से अपनाओ और भिन्न-भिन्न रंगो से ज़िंदगी की इस किताब को और रंगीन और दिलचस्प बनाओ।

एक वादा…खुद से…खुद के लिए…

जो टूटा है उसे बना लेंगे, जो खोया है उसे ढ़ूढ लेंगे,

जो बिछड़ा है उसे मिला लेंगे, जो रूठा है उसे मना लेंगे।

ज़िंदगी पल दो पल की है इसे हँसते खेलते बिता देंगे, छोटी छोटी बातों में फंस के इसे यूंही व्यर्थ न गंवा देंगे।

सभी गिले शिकवे भूला के मैत्रि और सम्वेदना के अखण्ड ज्योत हम जला लेंगे, और हर एक का जीवन खुशियों के अमर दीप से सजा देंगे।

Musings….

Before reaching any conclusion regarding people or situations we should put ourselves in the place of those we are judging. We should learn to see things from other’s perspective. This will help erase misplaced resentments. And a sense of mutual understanding and empathy will be created and a spirit of co-operation will bring in harmony and well-being.

We should not be busy only for the sake of being busy as this will only leave us exhausted and drained out. Instead we should occupy ourselves with something truly fulfilling and really enriching. It might take time and effort to find out what it is, but it is certainly worth investing in and then pursuing it wholeheartedly. This will give us a sense of deep contentment and lasting joy.

The Almighty has blessed us with the power to choose and it is subject to our discretion for use, misuse or abuse. We have to choose wisely discerning between the fair, self-will and the God’s will.

The best of times and the worst of times, the splendid season and the inclement climes, will not last forever for any reason or rhyme, as such is the Nature of Time, so just let go and always remember, the sun sets only once again to rise and shine!

When in doubt do not hesitate to communicate, there might either be a confrontation or a clarification, anyways, the air will get clear of all contamination!

Always mind your words, never say what you don’t mean. The meaning and message should neither get lost nor distorted in the web of words.

And above and over all a prayer for everyone, dear Lord, grant us this one boon, save us from ourselves!!!

विचार-विमर्श

प्रत्येक घटना जो हमारे साथ संघटित होती है, वह हमे कुछ न कुछ सिखाने के प्रयोजन से ही होती है। इसीलिए, भले ही घटना भुला दें, परन्तु उससे मिली सीख हमेशा ही याद रखें। सम्भवतःसीख के अमृत से दुर्भाग्यपूर्ण घटना की कड़वाहट भी कम हो जाएगी।

हमारा विश्वास ही हमारा सबसे शक्तिशाली सुरक्षा-कवच है। विश्वास ही हमारे जीवन का आधार है। इसीलिए, इसे सदा ही सुढृड़ बनाए रखें। जीवन में आने-जाने वाले हर तूफान का डट कर और सफलतापूर्वक सामना कर ही लेंगे।

हम शुरुआत तो स्व कल्याण से करते हैं, मगर पथ पर चलते-चलते जन कल्याण की ओर बढ़ जाते हैं।

जैसे-जैसे हम परमात्म पथ पर आगे बढ़ते हैं तो पाते हैं की, हर किसी में परमात्मा का अंश मौजूद है और इस नाते सभी अपने हैं, और यह अपने-पराय का खेल बिल्कुल ही अर्थहीन सा लगने लग जाता है।

हम जो ढूंढ़ंगे, वही पाएंगे। जैसे सोचेंगे, वैसे ही बन जाएंगे। जो देखना चाहेंगे, वही देखेंगे। इसीलिए, हमेशा ही अच्छा सोचने और बनने का प्रयास करें। जीवन खुशहाली से भर जाएगा।

सोच पर ही सारे जीवन का दारोमदार है। सोच बदलने से ही ग़मगीन जीवन खुशनुमा बन जाता है। सोच की दिशा पर ही जीवन की दशा निर्भर करती है। हमारी सोच ही सफल जीवन की कुंजी है। इसी एक बात को समझ लेने से सच्चे ज्ञान, ध्यान और कल्याण की यात्रा की शुरुआत हो जाती है।

कहते हैं, मन को साधना ही ईश्वर की अराधना है। जैसे-जैसे मन का दर्पण साफ होता जाएगा, वैसै-वैसे इसमें छिपा ईश्वर का अक्स उभरता चला जाएगा।

जब हमारा मन उदासी और मायूसी के काले बादलों से घिरा रहता है तब हमारा शरीर भी धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ने लगता है। हमारी मनःस्थिति का सीधा और गहरा असर सबसे पहले हमारे शरीर पर ही पड़ता है। इसीलिए, कूविचार के कीचर से निकल सूविचार के सागर में मोती तलाशें और अपना जीवन तराशें। अब भला यूं ही तो नहीं कहते, मन स्वस्थ तो तन स्वस्थ!