जगमगाते चिराग

जब तक ज़िंदगी है उम्मीदों के चिराग जलाए रखना, उदासियों के सायों से खुद को बचाए रखना, सहरा कितना ही गहरा क्यों न हो, फ़िजाएं फिर मुस्कराएंगी इतना एतबार रखना।

क्योंकि, रात के बाद सवेरा होता ही है, अमावस्य के बाद चाँद चमकता ही है, सूखे के बाद बादल बरसता ही है, यह तो कुदरत का नियम है वक्त का पहिया तो आगे बढ़ता ही है।

सच्चा सौंदर्य

नाम-रूप, तो हैं जैसे आते-जाते छांव-धूप।

शरीर है नश्वर और इसका सौंदर्य है बस क्षण भर, समय और काल हैं भारी इस पर।

परमात्मा है अमर, अजर, निराकार, और यही है हमारी आत्मा का आधार, अत: हमारी आत्मा भी है आकार-प्रकार-विकार के पार।

आत्मा का श्रृंगार है ज्ञान, ध्यान और सत्संग, और प्रभु सुमिरन में बिताया हर क्षण निखारता है सौ गुना इसका रूप-रंग।

इसलिए, काया की माया में कभी न फंसना, आत्मा ही है परम सत्य, इस बात को सदा स्मरण रखना।

अचूक नुस्खा

खुशी की खुराक, ले लो तो होगी तबीयत ठीक चाहे कितनी भी क्यों न हो खराब।

एक गोली सुबह, एक दिन और एक शाम, तकलीफ कितनी ही क्यों न हो मिलेगा ज़रूर आराम ।

जब जाना दवाखाना, उससे पहले ही यह बात ठीक से समझ जाना, तो फ़िर शायद कभी हो ही न वहाँ जाना।

न कोई खर्चा और सबसे अच्छा पर्चा।

सर्वश्रेष्ठ गुरु

यह तो एक शाश्वत प्रश्न है, कैसे पहचाने हम अपना सच्चा गुरु, और कैसे हो हमारी आध्यात्मिक यात्रा शुरू?

अब प्रश्न है, तो उत्तर भी इसका अवश्य है। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, वरन एक परम सत्य है, की हमारी आत्मा ही हमारी प्रथम व सर्वश्रेष्ठ गुरु अतुल्य है।

आत्मा ही तो है वह अमर ज्योत जो है ज्ञान का सच्चा स्रोत।

परंतु आत्मा ही क्यों, तो अर्थ स्पष्ट होता है कुछ यूं,

हमारी आत्मा में हमारे सभी पूर्व जन्मों के कर्मो के हिसाब-किताब का खाता है। और हमारा किस कार्य व उदेश्य में हित या अहित है यह आत्मा को सहज ही ज्ञात हो जाता है ।

परमात्मा है जैसे सूरज और हमारी आत्मा है उससे बिछड़ी एक किरन, और मानव जीवन लक्ष्य ही है आत्मा से परमात्मा का मिलन। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमे करना ही होगा आध्यात्मिक पथ का चयन।

जब होगा प्राप्त हमे आत्मा का मार्ग दर्शन, तब रखेंगे हम आध्यात्मिक पथ पर पहला चरन और बढ़ते-बढ़ते मिल ही जाएगी हमे एक न एक दिन इश्वरिय शरन।

अपनी आत्मा के सानिध्य में, यात्रा का शुभारंभ करते हैं उत्साह और उमंग में।

जानने के लिए आत्मा के दिव्य गुण और समझने के लिए आध्यात्मिक दर्शन आवश्यक है स्वाध्याय व अध्ययन ।

निरंतर चिंतन व ध्यान से हमे मिलेंगे आत्मा के अद्भुत अनुभव के प्रमाण और इसके साथ ही होता रहेगा हमारा आत्मिक कल्याण ।

शांति का उपवन

हमेशा इस बात का रखना ध्यान की मनुष्य तो है ब्रह्मांड में सिर्फ एक मेहमान, और प्रकृति ही रहेगी यहाँ अनंत विराजमान ।

अपने कर्मो का हिसाब-किताब बराबर करने आता ही रहेगा मानव बार-बार, मगर प्रकृति है काल और कर्म के पार।

मनुष्य हमेशा आता है यहाँ ले के नित नए स्वरूप, परंतु प्रकृति का अस्तित्व तो है शाश्वत व स्थिर क्योंकि प्रकृति तो है ईश्वर का ही प्रकट रूप ।

प्रकृति की है अपनी लय और गति, इसमें नहीं आती कभी कोई कमी या अति, यह तो मानव मन है जिसमे चलता ही रहता है कोहराम हर घड़ी ।

इसीलिए, जब कभी मन में मचा हो शोर, तो फ़िर बढ़ चल प्रकृति की ओर क्योंकि यहाँ बिखरा है आनंद और फ़ैली है शांति की किरने हर छोर।

मन मंथन

मन तो करता ही रहता है अपनी मनमानी, लेकिन हमे है आज इसे एक अच्छी बात समझानी, की मनमौजी मन, अभी करने दो हमे थोड़ा प्रभु ध्यान और सुनने दो अमृत वाणी।

क्योंकि, हमे है पता की तुम्हे है हमे क्या बात बतानी, तुम्हारी तो वही है कहानी पुरानी, कही-सुनी ही तो है तुमने फ़िर दोहरानी। मनचले मन, तुम तो हो चंचल, यह बात तो है अब हमारी जानी-मानी और तुम्हारी हर चाल है जानी-पहचानी।

इसीलिए, अब नहीं चलेगी तुम्हारी कोई भी आना-कानी, हमे बहकाने मे न मिलेगी तुम्हे ज़रा भी काम्याबी, भले यह जान कर होगी तुम्हे ज़रूर हैरानी, की अब प्रभु पथ पर चलने की है हमने ठानी, और इस निश्चय का नहीं कोई भी सानी।

Help Thyself

To resolve any issue in life, be it personal, mental, social, or physical we have to identify its root cause. One of the basic causes of physical ailment is the conflict between the mind and the soul. When the agitation of the mind clashes with the natural peace of the soul then it manifests itself in the form of physical afflictions. We have to resolve this constant state of war and arrive at a lasting sense of tranquility and well being. For this we have to understand both the nature of the mind as well as that of the soul.

Through the mind we respond to the activities of the external world. Thoughts are the food for mind. So we have to be very careful of the kind of thoughts which arise in our mind. We have to continuously distill the mind from the toxic thoughts which arise from time to time in the mind and replace these with encouraging and motivating ideas. And we have to make this a day to day practice. The mind is sometimes full of opposing thoughts leading to a state of imbalance, agitation and disturbance. At such times we should use our intellect to control our wayward mind. Intellect is the faculty to distinguish between the good and bad and the right and wrong. It is a unique gift of the Divine bestowed solely on the humankind amongst all other beings in the Universe. We do not have to fall prey to the illusions created by the mind and learn to exercise our Intellect at all times. We can regulate our mind through a constant practice of reflection and contemplation. And make patience and discretion our cornerstone of life.

Peace, bliss and contentment are the attributes of the soul. It resides deep within all of us. We must learn to connect with it. It is in a dormant state, we have to learn to activate it in order to bring forth its innate qualities alive in our everyday life and fill it with the fragrance of love and joy. The soul exists in its latent form in all of us whether we realise it or not. It resides within all of us in its unacknowledged form waiting to be realised. A person is in existence only because of presence of the soul. Once the soul leaves the body a person ceases to exist. We should try to realise our spiritual essence through self study and learning of texts and scriptures. We should also try to connect with our soul through practice of yoga, dhyaan and pranayam.

These practices will enable us to realise our true and higher self and resolve the internal conflict of the mind and the soul. We will no longer be pulled in opposing directions and will be well on our way to internal as well as external healing and the speed and efficacy of physical recovery during the course of the curative measures which is in progress or is yet to begin will also be accelerated and strengthened. Therefore, help yourself to heal yourself.

एक विचार असंख्य आकार

पात्र तो अत्यंत आकर्षक है, करता है मन को मोहित। पात्र में विष है या अमृत, पदार्थ शुद्ध है या दूषित?

क्योंकि,पात्र तो एक न एक दिन ढह जाएगा पदार्थ ही है जो रह जाएगा।

पात्र से पदार्थ या पदार्थ से पात्र? यह तो है एक प्रश्न मात्र,परंतु इसी उत्तर में छिपा है सम्पूर्ण जीवन शास्त्र।

धर्म का मर्म

धर्म वह है, जिससे इन्सान इन्सान के काम आए।

धर्म वह है, जो लोगों को आपस में सौहार्द और भाईचारे से रहना सिखाए।

धर्म वह है, जो मनुष्य को परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग दिखाए।

धर्म वह है, जो मन में, जीवन में सुख, शांति और संतोष की किरने फ़ैलाए।

एक जागृत चयन

हमारे मन में ही रहते हैं दोनो देवता और दानव, यह हर एक पर निर्भर करता है की किसको चुनता है मानव ।

दोनो का है हम में ही वास, यह हमारा है चुनाव हम रहें किसके पास।

दानव है, काम, क्रोध, लोभ, मोह, एहंकार व अन्य सभी विनाशकारी विकार।

देवता हैं, प्रेम, त्याग, करुणा सहज स्वभाव व हर कार्य में निस्वार्थ और शुद्ध भाव।

संसार के समस्त जीव जंतुओं में ईश्वर ने केवल मनुष्य को दिया है विवेक का दिव्य उपहार, और अपनी इसी सूझबूझ व समझदारी से हम कर सकते हैं भवसागर पार।

और इस अद्भुत चयन शक्ति से हम करेंगे मन की दानव प्रवृति का दमन व आत्मा के दिव्य गुणों को नमन और अपने एक नए जीवन का सृजन।